Politics of reservation-Prof Sudhakar Dixit

 इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में दिसंबर, 1980 मंे मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की सिफारिष की थी लेकिन संभवतः यह इंदिरा सरकार की नीति ही मानी जायेगी कि उसने इस रिपोर्ट का संज्ञान लेकर इस पर कार्रवाई नहीं की। लेकिन देष के सौभाग्य या दुर्भाग्य से अपनी ईमानदारी के लिए मषहूर विष्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी और उस सरकार से बहुत सी आषाएं भी जनसामान्य को थीं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लालकृश्ण आडवाणी की तत्कालीन रथयात्रा को रूकवाने अथवा उसे विफल बनाने की अदूरदर्षितापूर्ण नीति के कारण एकाएक विष्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार लड़खड़ाने लगी और अपनी सरकार को बचाने के लोभ में विष्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में ठंडे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग की रिपोर्ट आनन फानन में बहस के लिए संसद में प्रस्तुत कर दी।

सभी राजनीतिक दल सत्ता के लोभी हैं ही और आरक्षण का मुद्दा जाति विषेश के लिए लुभावना झुनझुना था जिसके चलते वोट के लोभ में किसी भी राजनीतिक दल ने मंडल आयोग के रिपोर्ट के संबंध में वास्तविक स्थिति को उजागर करने का साहस नहीं जुटाया। अतः विष्वनाथ प्रताप सिंह अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के इस दाव को चलकर भी अपनी सरकार तो नहीं बचा सके लेकिन उन्होंने आरक्षण जैसे देष को बर्बाद करने वाले एक दानव को मंडल आयोग की रिपोर्ट की फाइल से बाहर तो निकाल ही दिया था। इसे चाहे-अनचाहे सभी सत्ता लोलुप राजनीतिक दलों ने अपने सिर माथे पर बिठा लिया। जिस आरक्षण को देष का संविधान लागू करते समय सीमित समय और सीमित उद्देष्यों के लिए लागू करने की बात कही गयी थी वह अब सुरसा बन गयी। अब तो आरक्षण का दायरा इतना बढ़ता जा रहा है कि अन्य धर्मावलंबी तथाकथित अल्पसंख्यकांे को भी षिक्षा एवं नौकरियों के क्षेत्र मंे आरक्षण देने की बात उठाई जा रही है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेष तथा पष्चिम बंगाल में तो इसे किसी न किसी रूप में लागू भी कर दिया गया है। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने मार्च, 2010 में अंतरिम सहमति भी दे दी। यद्यपि यह मामला अंतिम निर्णय के लिए अभी सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

मुझे या किसी भी समझदार भारतीय को इतने अंष में तो बहुत ही प्रसन्नता है कि कमजोर जाति के अपने भाई बंधु तथा अन्य भी भारत मंे रहने वाले तथाकथित निरीह अल्पसंख्यकांे को यथासंभव अधिक से अधिक राहत प्रदान की जाय।

अपना भारतीय आर्दष भी यही है, ‘‘एतावान् हि प्रभोरर्थो यद् दीन परिपालनम्’’

वास्तव मंे प्रभुता यही है कि सर्वप्रथम दीन-हीन की रक्षा की जाय और इस आर्दष के साक्षात् दृश्टांत स्वयं महादेव श्री षंकर हैं जिन्होंने विशपान करके समूचे धरातल को भस्म होने से बचा लिया पर मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि बिना किसी पक्षपात के एक ढंग की प्रषस्त षिक्षा प्रणाली अपनाने के लिए षासकीय स्तर पर प्रयास क्यों नहीं किया जा रहा है जिससे संभवतः हमारे समाज की सभी बुराइयों को दूर किया जा सके।

क्या यह सर्व मान्य तथ्य नहीं है कि किसी भी पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिए और उच्चतम षिक्षा संस्था में प्रवेष पाने के लिए अनुरूप योग्यता सबसे पहली आवष्यकता है और ऐसी योग्यता ही भविश्य की दृश्टि से देष के लिए कल्याणकारी भी है, पर ऐसा न करके क्या योग्यता बढ़ाने के दायरे की उपेक्षा नहीं की जा रही है और क्या यह उपेक्षा निकट भविश्य में देष की व्यवस्था चरमराने मंे सहायक नहीं बनेगी। साथ ही वास्तव मंे अभावग्रस्त विभिन्न वर्गों के लोग एवं अन्य धर्मावलंबी सच्चाई के धरातल पर क्या उपेक्षित नहीं होंगे।

अखबारों मंे प्रायः यह पढ़ने को मिल रहा है कि रेलवे में अधिकतर दुर्घटनाएं हो रही हैं और चिकित्सकीय क्षेत्र में तथा अन्य तकनीकी क्षेत्र में गैरजिम्मेदारी के कारण सामान्य जनता को कितनी परेषानी उठानी पड़ रही है। अधिकांष लोगों का यह अभिमत सुनने को मिलता है कि इस तरह की कश्टदायी स्थितियां अधिकतर अयोग्य लोगों के विभिन्न पदों पर एवं उच्चतम षिक्षा के क्षेत्र मंे प्रवेष के कारण ही पैदा हो रही हैं। साथ ही देष के अनेक नौनिहाल अच्छी योग्यता रहते हुए भी आरक्षण के नाम पर अवसर से च्युत होने के कारण अपनी उन्नति के लिए निराष होकर विभिन्न आपराधिक कृत्यों एवं संगठनों से जुड़कर अपने ही देष की जड़ खोदने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ऐसे कृत्यों को कथमपि उचित नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन आरक्षण जैसी नीति लागू कर क्या समाज भी इसके लिए एक हद तक जिम्मेदार नहीं है।

आज की जो दोहरी षिक्षा प्रणाली है जिसके कारण प्रतिभाषाली छात्र भी धन के अभाव में उचित षिक्षा का अवसर न पाकर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पा रहे हैं क्या उसे रोका नहीं जा सकता ?

यह तथ्य है कि यदि धन लोलुपता के कारण सत्ता में बने रहने की प्रवृत्ति आ जाती है तो देष रक्षा का भाव केवल मंच पर ही प्रकट किया जाता है। भीतर-भीतर तो देष की रक्षा की अनदेखी कर अपने स्वार्थ को ही सिद्ध किया जाता है।

जिस देष में षासक यह कहते हों कि गो हत्या बंद कर देने पर देष के राजस्व की बहुत बड़ी क्षति होगी। जिस देष के वर्तमान षासक भी षराब पीना नुकसानदेह मानते हुए भी षराब बंदी दृढ़ता के साथ इसलिए लागू नहीं कर रहे हैं कि षराब से प्राप्त होने वाले बड़े राजस्व की पूर्ति कैसे होगी। उस देष में उग्रवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, हिंसा और अन्य अपराध अपने खतरनाक रूप में देष की आंतरिक सुरक्षा को ध्वस्त करने पर तुले हैं तो इसमें आष्चर्य ही क्या है?

सत्ताधारियों की धन लोलुपता ही आज देष में दोहरी षिक्षा प्रणाली को प्रश्रय दे रही है क्योंकि इसी के माध्यम से विभिन्न स्रोतों से उन्हें अकूत धन मिल रहा है। इसीलिए षिक्षा व्यस्था में सुधार कर एकल षिक्षा प्रणाली अपना कर देष के भविश्य को सुधारने की बात दर-किनार की जा रही है और आरक्षण जैसी रेवड़ी बांट कर अयोग्यों की लंबी कतार बढ़ाई जा रही है जो देष के लिए हर दृश्टि से खतरनाक है। संविधान की मूल भावना में आरक्षण विषेश परिस्थितियों में कुछ काल के लिए देने की बात थी लेकिन राजनीतिक हित साधन के लोभ में राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को वोट की राजनीति से जोड़ दिया और अब देषहित से समझौता कर इसे अनन्त काल के लिए लागू करने का दुश्चक्र रचा जा रहा है।

पता नहीं वह षुभ दिन कब आयेगा जब सत्ता के साथ धन लोलुपता का संबन्ध नहीं होगा और जनहित के लिए सत्ता संभालने की भावना जागेगी जिसके कारण अनंत काल के लिए आरक्षण जैसे निंदनीय दावपेंच बंद होंगे और वास्तविकता के धरातल पर अपने देष में रहने वाले निम्न जाति के लोगों को तथा अन्य धर्मावलंबी लोगों को सही अर्थ में हर तरह से षक्तिषाली बनाया जा सकेगा और देष का वास्तविक विकास कर इसे महाषक्ति बनाया जा सकेगा।