duel character of Indian politicians

 लोकपाल पर नेताओं का दोहरा चरित्र

लोकपाल को लेकर टीम अन्ना और कांग्रेस में मची घमासान के बीच सरकार ने आखिर लोकपाल बिल संसद में पेष कर दिया। लेकिन संसद में अनेक दलों के सांसदों ने अपने राजनीतिक अनुभवों का जबर्दस्त इस्तेमाल किया और वे अपने वास्तविक दोहरे चरित्र में नजर आये। किसी ने सरकार के बिल को सख्त नहीं माना तो कोई इस बिल में प्रधानमंत्री को लाने पर ही आपत्ति जता रहा था लेकिन भाजपा के अलावा लोकपाल संस्था में आरक्षण के मुद्दे पर किसी ने कुछ नहीं कहा।  

  सरकार ने अन्ना के पहले आंदोलन के लगभग नौ महीने बाद तो लोकपाल बिल संसद में पेष किया लेकिन उसकी मंषा कुछ और ही है क्योंकि वह जानती है कि अगर लोकपाल बिल से कुछ और दिन छुटकारा पाना है तो इस बिल में आरक्षण समेत ऐसे मुद्दों को तूल दे दो जिन पर हंगामा होना लाजमी हो। षायद इसी सोच के साथ उसने लोकपाल बिल में आरक्षण की बात की है।

  यह तो सभी जानते हैं कि हमारे देष के राजनेता अपने वोट और गद्दी के लिए कभी भी आरक्षण का विरोध नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें पता है कि अगर उन्होंने आरक्षण का विरोध किया तो इसका सीधा असर उनके वोट पर पड़ेगा। यही सोच कर सरकार में मौजूद  तीन नामचीन अधिवक्ताओं ने मिलकर लोकपाल बिल को इतना कमजोर और आरक्षण समेत अनेक अड़ंगों के साथ तैयार किया है कि यह बिल संसद में पास ही न हो पाये और जब यह बिल संसद में पास नहीं होगा तो वे बिल पारित न होने का आरोप विपक्षी पार्टियों पर लगा सकें।

 प्रथम दृश्ट्या ऐसा लगता है कि अधिवक्ताओं ने अपने षातिर दिमाग का पूरा इस्तेमाल करके इस बिल को बनाया है। उन्हें आषंका है कि हो न हो अगर लोकपाल के अधीन सीबीआई को रखा गया तो उनके साथ कांग्रेस के कई दिग्गज नेता जेल के सलाखों के पीछे नजर आयेंगे।

   बहरहाल सरकार ने लोकपाल बिल को संसद में पेष कर दिया है। इस बिल के आते ही विपक्ष की नेता सुशमा स्वराज ने आरक्षण के मुद्दे पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे वापस करने की मांग की। लालू यादव ने तो संसद से जनता को सीधा ललकारते हुए कहा कि अब तो जनता ने उन्हें पांच साल के लिए चुन दिया है और वे पांच साल तक जो चाहे वो कर सकते हैं। संसद में उनका यह बयान चकित करने वाला था कि ‘‘षासन रौब से चलता है‘‘ यानि जनता का कोई हक नहीं है। जनता को अपने ही द्वारा चुने गये प्रतिनिधि के सामने अपनी बात रखने और उसे मानने के लिए कहने का अधिकार नहीं है। यह तो सबको पता है कि कानून संसद में ही बनता है लेकिन जहां पर इस तरह की सोच रखने वाले सांसद हों तो सख्त लोकपाल बनने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है।

 इतना ही नहीं लालू यादव ने बहकते हुए कांग्रेस पार्टी के लोगों को ही समझाते हुए कहा कि आप लोग भूल कर भी सीबीआई को लोकपाल के दायरे में नहीं लाइयेगा। सीबीआई को सरकार के नियंत्रण में ही रहना चाहिए। लालू यादव सहित सभी नेताओं को पता है कि अगर सीबीआई सरकार के नियंत्रण में है तो वह उसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए ही करती है। इसी के चलते सरकार के इषारे पर सीबीआई जिस पर अपना षिकंजा कसती है अगर वो सरकार की षरण में चला जाता है तो उसे सीबीआई के डर से आजादी मिल जाती है। दूसरी तरफ यदि सीबीआई लोकपाल के दायरे में आ गई तो लालू को पता है कि देष के कई मानिंद नेताओं के साथ  क्या हो सकता है।

  इससे पहले जंतर मंतर पर जब अन्ना ने ग्यारह दिसंबर को एक दिन का अनषन किया था तो सीपीएम, भाजपा, सपा के प्रतिनिधि वहां पर पहुंचे थे और उन लोगों ने सीबीआई को सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने और लोकपाल के अधीन करने की बात कही थी लेकिन संसद में उन्ही लोगों ने अलग सुर अलापे जो देखने लायक था।  

  बहरहाल सरकार के अधिवक्ता त्रिमूर्ति ने जिस सोच के साथ इस लोकपाल बिल को तैयार किया था वह फलीभूत होती नजर आ रही है लेकिन अन्ना टीम सहित इस देष की जनता इतनी बेवकूफ नहीं है कि वह इन लोगों की राजनीति को नहीं समझ रही है।

  अब जनता को ही फैसला करना होगा कि लालू जैसे नेता संसद में इस तरह का बयान देकर संसद में फिर से जाने के लायक रह सकते हैं या नहीं और सख्त लोकपाल के मुद्दे पर किसका दामन साफ है और किसका दागदार है।