धर्म सापेक्ष तथा अर्थ निरपेक्ष हो राश्ट्र

धर्म सापेक्ष तथा अर्थ निरपेक्ष हो राश्ट्र

कई प्रदेषों में चुनाव होने जा रहे हैं जबकि देष में आम चुनाव दो वर्शों बाद वर्श 2014 में हांेगे। इनका परिणाम क्या होगा ? संभवतः इतना ही होगा कि संविधान के अनुसार नई विधानसभाओं और लोकसभा का गठन हो जाएगा। संभवतः कहीं कई पर्टियों के मिले जुले लोग, कहीं कदाचित किसी एक पार्टी के ही लोग बहुमत में होकर विधानसभा के सदस्य होंगे और नई सरकार अस्तित्व मंे आ जायेगी।

लोकतंत्र के नाम पर अकूत धन खर्च कर देष की जनता को क्या हासिल होगा? क्या जनता से यही कहा जायेगा कि हम जनता के प्रतिनिधि हैं, हम ही जनता की या देष की भलाई के लिए जो उचित समझेंगे करेंगे और इसमें जनता की कोई दखल अंदाजी नहीं होनी चाहिए।

अब समझदार लोगों को निश्पक्ष होकर यह सोचना चाहिए कि क्या जनता का अधिकार इतना ही है कि वह अपने प्रतिनिधि के पक्ष में मत दे दे और उसके बाद उसको अपनी कोई सलाह,:जो निष्चित रूप में देषहित में है, न दे सके। इसका तो अर्थ यही हुआ कि षासन जनता के लिए और जनता का न होकर कुछ इने-गिने जनप्रतिनिधियों का और स्वयं उनके हित के लिए ही होगा। ऐसा इसलिए मानना पड़ रहा है कि एक तरफ तो वर्तमान भारतीय संविधान में धर्म निरपेक्षता का सिद्धांत अपनाया गया और दूसरी ओर अंग्रेजों के षासनकाल से ही जैसा षैक्षणिक माहौल है उसमें किसी भी प्रकार का उल्लेख्य परिवर्तन न करने के कारण अधिकतर नागरिक अत्यधिक अर्थ सापेक्ष ही हो गये हैं। इसका अर्थ यह है कि एक तरफ धर्म निरपेक्षता के नाम पर परोपकार, परहित साधन आदि की भावना से आज का अधिकतर नागरिक दूर होता जा रहा है और अर्थ सापेक्ष होने के कारण संपत्ति जुटाने के लिए निरंकुष रूप से आगे बढ़ने की भरपूर कोषिष कर रहा है।

धर्म निरपेक्षता का अर्थ वास्तव में सर्व धर्मसमभाव ही होना चाहिए और यही भारत की अपनी विषेशता है पर धर्म निरपेक्षता को इस अर्थ में न लेकर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि की सुविधा को दृश्टि में रखकर इसे धर्म की उपेक्षा के अर्थ में लिया जा रहा है और इसी का दुश्परिणाम है आज का भ्रश्टाचार नाम का दानव।

क्या यह आष्चर्य का विशय नहीं है कि यदि कोई भ्रश्टाचार मिटाने के लिए आवाज उठा रहा है तो उसका मुंह बंद करने के लिए हर संभव कोषिष आज के अधिकतर नेता कर रहे हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि आज जिनके हाथ में षासन है वो संभवत: दो मुंहे सांप की तरह हैं क्योंकि एक तरफ तो वे कहते हैं कि भ्रश्टाचार मिटना चाहिए दूसरी ओर भ्रश्टाचार के विरोध में आवाज उठाने वाले लोगों को जिस किसी भी तरह लांछित कर रोकने का प्रयास किया जा रहा है ऐसा क्यों ? इस प्रष्न पर विचार करते समय मुझे तो यही लगता है कि संपत्ति इकठ्ठी करने के लोभ से सभी नेता ग्रस्त हैं और वे किसी न किसी रूप में भ्रश्टाचार के षिकंजे मंे कसे हुए हैं। इसलिए अपनी पोल खुलने के डर से भीतर ही भीतर भ्रश्टाचार के संरक्षण में जुटे हैं।

यदि ऐसे ही अर्थ लोलुप लोग फिर अपनी चतुराई पूर्ण गतिविधि से जनता को लुभाकर षासन-सत्ता हथिया लेते हैं तो क्या ये होने वाले चुनाव देष की गिरती हुई साख को बचाने में कारगर हो सकेंगे ?

मेरा तो यह मानना है कि भारतीय राजनीति जो अपने पारंपरिक संस्कृत साहित्य में सुरक्षित है उसके अनुसार यदि षैक्षणिक वातावरण बनाया जाय तो अमर्यादित अर्थ लोलुपता के क्षरण के साथ परोपकार, परहित साधन जैसे उदार धर्म के प्रति समर्पण का भाव नागरिकों में आ सकता है। इसकी पहल यदि ईमानदारी से की जाय तो कुछ वर्शों के बाद ही वास्तव में आर्दष नागरिक सुलभ होंगे और उनके जनप्रतिनिधि होने पर देष की सही अर्थ में प्रगति होगी। हमारी भारतीय राजनीति स्पश्ट कहती है --

         ‘‘श्रूयतां धर्मसर्वस्वम्

              श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।

         परोपकार: पुण्याय, 

              पापाय परपीडनम् ।। ’’

धर्म का सार यही है कि परोपकार करना ही पुण्य है और परपीडा:दूसरे को किसी भी तरह से पीड़ा पहुंचानाः ही पाप है।

इस तरह का भाव यदि षिक्षा के माध्यम से बचपन से ही बालक बालिकाओं में भरा जाय और परिवार के सदस्य भी इस प्रकार का भाव अपनाने के लिए अपने बालक बालिकाओं को प्रेरित करें तो क्या पूरी तरह से भ्रश्टाचार का उन्मूलन संभव नहीं है? संपत्ति अधिक बटोरने का भाव तो भारतीय राजनीति में बहुत ही निंदनीय माना गया है। इसीलिए नागरिक को यह षिक्षा दी जाती है---

        ‘‘ यावद् भ्रियेत जठरम्,

                तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।।

          अधिकं यो उ भिमन्येत,

                  स स्तेनो दण्डमर्हति ।।’’

जितने से आपकी आवष्यक अपेक्षायें पूरी हों उतनी ही संपत्ति को अपना मानना चाहिए। इससे अधिक संपत्ति को अपना मानने वाला चोर है और वह दंडनीय है।

  यदि कदाचित व्येवहारिक दृश्टि से यह आदर्ष अपनाने में वस्तुतः कठिनाई हो तो नागरिक को संपत्ति के प्रति ईमानदार होेने के लिए अन्य उपाय भी भारतीय ाराजनीति में बताये गये हैं-

              ‘‘ धर्माय, यषसेर्थाय, कामाय, स्वजनाय च ।

               पंचधा विभजन् वित्तमिहामुत्र च मोदते ।। ’’

अपने द्वारा अर्जित संपत्ति का पांच भाग करना चाहिए-1- धर्म के लिए 2-यष बढ़ाने के लिए 3-अर्जित संपत्ति को और अधिक बढ़ाने के लिए 4- अपनी सुख सुविधा के लिए 5-अपने बंधु बांधव के लिए।

इस तरह से अपनी संपत्ति का विभाग करके यदि उसका उपभोग किया जाय तो इस लोक में तथा परलोक में सदा सुख एवं षांति ही मिलती है।

इस तरह का भाव यदि हम संपत्ति संग्रह करते समय अपनाएं तो न भ्रश्टाचार के लिए कोई गुंजाइष रहेगी न अपनी सामान्य आवष्यकताओं की पूर्ति में कोई कमी होगी तथा अपने कुल में या परिवार जन में विघटन नहीं होगा और देष हर तरह से समृद्ध होगा।

क्या यह आषा की जाय कि इस दृश्टि कोण को ध्यान में रखकर धर्म सापेक्ष एवं अर्थ निरपेक्ष नागरिक के निर्माण की दिषा में दमदार कोषिष होगी जिससे व्यक्ति, समाज एवं राश्ट्र सही अर्थ में अपने वर्तमान एवं भविश्य को स्वर्णिम बना सकें।