पुलिस में सुधारों के लिए पुलिस कमीशन की स्थापना

 ‘पुलिस भली और शांति प्रिय जनता के लिए आतंक बन गयी थी‘’ और ‘समाज के लिए हानिकारक कीटाणु, समुदाय के लिए आतंक और जनता के कष्टों और असंतोष का आधा कारण पुलिस थी‘2 ये बातें 1855 में नियुक्त किये गये टार्चर कमीशन के सामने कही गयी थीं। टार्चर कमीशन ने अपनी रिपोर्ट 1855 में समर्पित की, जिसे मद्रास गवर्मेंट द्वारा स्वीकार करते हुए पुलिस में सुधार की आवश्यकता उसी समय महसूस कर ली गयी थी। किंतु इसके बाद जो सुधार किये गये वे पर्याप्त साबित नहीं हुए और पुलिस में सुधारों के लिए पुलिस कमीशन 1860 की स्थापना की गयी। यद्यपि इस कमीशन के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किये गये थे, वे बहुत आशाजनक नहीं थे। इस कमीशन के सामने ब्रिटिश इंडिया में पुलिस प्रशसन को बेहतर बनाने परंतु पुलिस पर खर्च कम करने के उपाय खोजने की शर्त रखी गयी थी। परिणामस्वरूप पुलिस एक्ट 1861 सामने आया जिसे तत्कालीन बाॅम्बे प्रेसिडेंसी को छोड़कर सभी राज्यों में लागू कर दिया गया।

भारत सरकार ने 1902 में दूसरा पुलिस कमीशन गठित किया क्योंकि 1860 के पुलिस कमीशन द्वारा सुझाये गये संगठनात्मक परिवर्तन संतोषजनक एवं आशातीत परिणाम नहीं दे सके। पुलिस कमीशन 1902-1903 की रिपोर्ट के ‘पाॅपुलर ओपिनियन रिगार्डिंग द पुलिस‘ अध्याय में उल्लेख किया गया कि जनता के बीच पुलिस की छवि भ्रष्ट एवं दमनात्मक चरित्रवाली है। इतना ही नहीं यह भी कि पूरे देश में पुलिस की स्थिति बिल्कुल असंतोषजनक है जिससे जन-भावनायें ही आघात नहीं हुई हैं बल्कि पुलिस के घृणित कार्यों के कारण सरकार की भी छवि खराब हुई है। यद्यपि इसका कारण पुलिस में बहुसंख्यक अशिक्षित एवं समाज के निचले तबके से आने वाले लोग बताया गया और यह उल्लेख किया गया कि इस समस्या को प्रशिक्षण की कमी, कार्य के अनुसार शिक्षा की कमी और कम वेतन ने और बढ़ा दिया है। इसी अध्याय में आगे लिखा गया है कि जनता के साथ सम्मानित व्यवहार करने, अनावश्यक कठोरता से बचने और पुलिस की क्रूरता रोकने का कोई उपाय नहीं किया गया। अधिकांश अन्वेषण अधिकारियों के भ्रष्ट एवं अक्षम होने की बात भी कही गई। पुलिस अधीक्षक के पर्यवेक्षण के काम को आवश्यकता के अनुरूप नहीं पाया गया और आयोग द्वारा यह सिफारिश की गई कि पुलिस सुधार में सबसे आवश्यक अधीक्षकों का चयन और ट्रेनिंग में बदलाव होना चाहिए। 

भारत सरकार ने इस कमीशन की रिपोर्ट पर 21 मार्च 1905 को आदेश जारी किये जिसमें गाॅंव के स्तर पर चैकीदारों को पुलिस के अधीन रखने के बजाय ग्राम प्रधान के अधीन रखा गया। अधीनस्थ पुलिस कर्मियों के चयन और प्रशिक्षण के प्रावधान के साथ-साथ असिस्टेंट सुपरिटेन्डेन्ट की नियुक्ति के प्रावधान बनाये गये तथा भारतीयों के लिए एक नये पद डिप्टी सुपरिटेन्डेन्ट का सृजन किया गया। इसके साथ-साथ क्रिमिनल इन्भेस्टीगेशन विभाग और रेलवे पुलिस की भी स्थापना की गई। पुलिस कमीशन 1902 के आधार पर आदेशों के निर्गत होने के उपरांत 1947 तक, जब अंग्रेजो ने हमारे देश को छोड़ा, पुलिस की कार्य -पद्धति और चरित्र को बदलने वाली अन्य कोई पहल नहीं हुई। यह भी संदिग्ध है कि 1905 के कथित सुधारों के आधार पर पुलिस के दृष्टिकोण में कोई सकारात्मक परिर्वतन हुआ। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई के कारण जनता के हृदय में पुलिस के प्रति और भी विक्षोभ पैदा हुआ। हा, यह जरूर कह सकते है कि पुलिस ने इस क्रम में सरकार के प्रति अपनी वफादारी प्रमाणित की होगी। यह बात मि0 ल्वाॅयड के इस कथन से असंदिग्ध रूप से प्रमाणित होती है -

‘भारतीय पुलिस से श्रेष्ठ पूरे साम्राज्य में कोई बल नहीं है। सरकार की सेवा वफादारी से करते हुए वे शांति व्यवस्था संचारित करते हैं जिसके विना कोई राजनैतिक व्यवस्था बरकरार नहीं रह सकती हैं।‘3

15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ लेकिन संगठनात्मक विकास की दृष्टि से पुलिस में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हो सका और 1861 में पुलिस को जो स्वरूप प्रदान किया गया था तथा 1905 में जो कमोवेश परिवर्तन हुए थे, स्थिति वहीं तक सीमित रही। हा, बाद के वर्षों में पुलिस बल की संख्या, सशस्त्र वाहिनियों की संख्या अवश्य बढ़ी और पुलिस अनुसंधान में तकनीकी तरीकों का समावेश हुआ, किंतु जनता के दृष्टिकोण से पुलिस में कोई दृश्यमान परिवर्तन नहीं हुआ। अतः जनता का दृष्टिकोण न तो पुलिस के प्रति बदला और न पुलिस का जनता के प्रति। एक बात अवश्य बहुत जोर-शोर से सामने आयी कि पुलिस के अनुशासन में गिरावट आ रही है, जिसका कारण पुलिस के काम में राजनीतिक हस्तक्षेप है। अपराधों में वृद्धि हुई और जनसुरक्षा भी घटी, लेकिन पुलिस को उत्क्रमित करने के बजाए इनके अन्य कारण खोज कर संतोष कर लिया गया। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान पुलिस पर कम बजट रखा जाता था, प्रशिक्षण तथा विधि-विज्ञान आदि विकसित करने पर भी बहुत ध्यान नहीं था जो बाद में किया गया। 

सी0आर0पी0एफ0, सी0आईएस0एफ0, बी0एस0एफ0, सी0बी0आई0 आदि विशिष्ट पुलिस संगठनों का निर्माण एवं सृजन भी 20वीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ। इस सबके बावजूद एक कमी कहीं न कहीं रह गयी है, जिसके कारण हर व्यक्ति में यह भावना है कि क्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जन-भावना के अनुरूप पुलिस लोकतांत्रिक बन सकी है? जवाहर लाल नेहरू ने 18 अक्टूबर 1958 को माउन्ट टाबू में आई0पी0एस0 प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए इसी समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा था कि, ‘यह सर्वप्रथम याद रखने योग्य बात है कि लोकतांत्रिक राज्य की पुलिस उन राज्यों की पुलिस से भिन्न होती है जो लोकतांत्रिक नहीं हैं।‘4