राष्ट्रीय खनिज नीति और नियंत्रक एजेंसियों के विविधता

नियंत्रण का दोहरापन और राज्य और नियंत्रक एजेंसियों के विविधता का असमान बजट के कारण खनिज पदार्थ के क्षेत्र में शासकीय विफलता एक प्रमुख कारण है।10 इस संबंध में देश में खनिज नीतियों को लेकर खासा विवाद दिखता है और कई तरह के आरोप लगाये जाते हैं। राष्ट्रीय खनिज नीति आदिवासियों, जिन्हंे उनकी जमीन में विस्थापित किया गया है, उनके राहत और पुनर्वास संबंधी विषयों पर अस्पष्ट है। अधिकतर आदिवासी उपेक्षित भू-धारक हैं जिनका कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं उपलब्ध है जिसके कारण वे जमीन पर अपने अधिकार को जता भी नहीं पाते है। कुछ लोगों द्वारा आरोप लगाया जाता है कि प्रचलित नीतियाँ पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय खनन लाबियों द्वारा प्रभावित हैं जो राष्ट्रीय हित के खिलाफ हैं। नीति अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों का पक्ष लेती है और सार्वजनिक कम्पिनियों की उपेक्षा करती है। 

आजकल खनन क्षेत्र में माफिया की घटना तेजी से बढ़ रही है। ये देश में कानून के शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं को चुनौती प्रदान कर रही इस तरह की हाल फिलहाल कर्नाटक, उड़ीसा, गोवा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ की घटनायें यह दिखाती हैं कि किस तरह से माफियाओं की लाॅबी और राजनीतिक व्यवस्था के गठजोड़ ने खनन क्षेत्र में नियमों और कानूनों का उल्लंघन किया है जो एक मुख्य चुनौती बनकर अभिशासन के समक्ष आया है।11 सरकार द्वारा गठित सक्सेना समिति ने बताया कि किस तरह से खनन समूह कानूनों का उल्लंघन करते हैं। पहले वे कब्जा करके गाँव के वनों को बिना किसी अनुमति के घेर लेते हैं। दूसरा, कम्पनी अपने कच्चे माल की आपूर्ति अवैध खनन के माध्यम से करती है। तीसरा, अपनी खनन की क्षमता को वे बढ़ा देती हैं जो पर्यावरण स्वीकृति के अन्तर्गत के अन्तर्गत नहीं आता है।12 इस तरह की चुनौतियाँ अभिशासन के समक्ष हैं जिन्हें दूर करना अत्यन्त आवश्यक है। पेसा एक्ट ;1996द्ध के तहत कहा गया है कि किसी भी जमीन के स्वीकृति के लिए ग्राम सभा की स्वीकृति आवश्यक है लेकिन लगातार इस कानून का उल्लंघन किया जा रहा है। इसके साथ ही आज कानून निर्माताओं के समक्ष माइन क्लोसर को समाहित करना भी एक एक महत्वपूर्ण चुनौती है। इस प्रकार शासन की विफलता के कारण अवैध खनन, कारपोरेट वर्गाें और माफियाओं को और अधिक मौका देता है जिसके कारण प्रभावित लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।

उपर्युक्त वर्णनों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आज देश में खनन गतिविधि को लेकर कई तरह के प्रतिरोध और दमन घटित हो रहे हैं जिसके कारण देश की खनिज संबंधी नीतियों और संस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जाता है जैसा कि हमने देखा कि किस तरह खनन की गतिविधियों में उसमें प्रभावित लोगों में और उन जगहों पर अराजकता को जन्म दिया और न ही उन में विस्थापित लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था है। खनन-सम्पन्न क्षेत्र होने के बावजूद इसमें प्रभावित लोगों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। जब भी सामाजिक, आर्थिक समता की बात आती है तब भारतीय राष्ट्रीय नीति इस पर मौन रहती है। नीति की प्रस्तावना सामाजिक न्याय के मुद्दे पर पूरी तरह से मौन है जबकि इसकी जगह देश के आर्थिक विकास के लिए खनन उद्योगों की भूमिका पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाता है।13

 इस सन्दर्भ में खनन अभिशासन में आज संस्थात्मक सहयोग की जरूरत है। इसके अतिरिक्त विनियमित संस्थाओं की स्वतंत्रता और पारदर्शिता के साथ विशेषज्ञता और क्षमता भी जरूरी है।14 इस तरह ही समस्याओं से निजात पाने में सफलता मिल सकेगी। सरकार की तरफ से यह सहमति भी मिलनी चाहिये कि राष्ट्रीय खनन विनियमित और स्थानीय खनन विनियमित स्वतंत्र होकर काम करें जिससे खनन क्षेत्रों के अभिशासन में अधिक विश्वास पैदा हो सके।15 इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि स्थानीय समुदायों का खनन क्षेत्रों में अधिक से अधिक भागीदार बनाया जाए और उनकी कीमत पर खनन गतिविधि को प्रक्रिया मे लाना एक तरह से राष्ट्रीय अपराध होगा। इन सब मुद्दों को ध्यान में रखकर ही सरकार को कोई कानून या नीति बनानी चाहिए ताकि उन स्थानीय निवासियों के हितों को भी ध्यान में रखा जा सके न कि केवल कारपोरेट, माफिया, राजनीतिज्ञों के निहित स्वार्थ को। विकास की अवधारणा अधिक परिस्थितिक, संवेदनशील और न्यायपूर्ण न होने के कारण इन क्षेत्र में विभाजन और विषमता को जन्म दे रही है। आदिवासी समाज दयनीय स्थति में हैं क्या विकास का हमारा माडल उन वंचित समुदायों के लिये है इस पर मनन करना होगा। इन मुद्दों और चुनौतियों को ध्यान मे रखकर ही कार्य करना होगा। आखिरकार ये किस तरह का विकास है जिसे क्रियान्वित करने के लिए हमें आपरेशन ग्रीनहंट और सलवा जुइूम जैसी कार्यवाई करनी पड़ रही है।