सुरीली स्वर सरिता

 सुरीली स्वर सरिता

ग्वालियर षहर रानी मृगनयनी और राजा मानसिंह तोमर के अमर पे्रम की कहानी का साक्षी है। इसी धरती पर गायक बैजू बावरा, मियां तानसेन, हाॅकी के जादूगर ध्यानचंद, सरोद वादक उस्ताद अमज़द अली ख़ान जैसे रत्नों ने जन्म लिया। यह षहर अपनी समृद्ध विरासत को संभाले हुए है। लगभग एक षताब्दी से यहां पर आयोजित होने वाला तानसेन संगीत समारोह भी इस षहर की विरासत का ही हिस्सा है। इसमें देष-विदेष के कलाकार और श्रोतागण इस आयोजन के साक्षी बनते हैं।

आयोजन का उद्देष्य

संगीत सम्राट मियां तानसेन मुग़ल दरबार के नवरत्नों में से एक थे। ग्वालियर में जन्मे मियां तानसेन ने पीर मोहम्मद गौस और स्वामी हरिदास से संगीत सीखा था। उन्हीं की याद में इस षहर में लगभग नब्बे साल से तानसेन उर्स यानी तानसेन समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर देष-विदेष के कलाकार आकर तानसेन के समाधि स्थल पर सुरों की स्वरांजलि अर्पित करते हैं। तभी तो संगीत सूर्य तानसेन ने यह पद रचा था, ‘‘तिमिर हरन प्रभातकर दिनकर। तेजस्कर जगन्मति दृगमनि विभाकर। सहस्र रस्मि भस्म करन, पतंग गोपता तम कौ रस्मिवान महामारतंड मैहर।‘’ उनकी यह रचना रागिनी गुर्जरी और त्रिताल में निबद्ध है। कई सदियां बीत जाने के बाद भी सुरों की वह चमक व तेजस्विता बनी हुई है। उनके पद की ही तरह, उनका व्यक्तित्व भी ओजस्वी रहा होगा। हम आज उसकी केवल कल्पना कर सकते हैं। उन्हीं की स्मृति में वर्शों से ग्वालियर के हजीरा में तानसेन के समाधि स्थल पर आज भी कलाकारों और संगीत प्रेमियों का मेला लगता रहा है और आगे भी लगता रहेगा। ग्वालियर के कण-कण में संगीत के स्वरों को महसूस किया जा सकता है। वैसे भी षास्त्रीय संगीत के सैकड़ों रत्नों ने ग्वालियर की धरती पर जन्म लिया है। इसलिए ग्वालियर और ग्वालियर घराने का विषेश महन्̀व होता है। घराने का मतलब है-विषिश्ट षैली या रीति। ख्याल गायन की कई षैलियां प्रचलित हैं। ख्याल यानी कल्पना, इसलिए यह स्वाभाविक है कि हर गायक की कल्पना-विलास के अनुसार उसकी गायकी अलग बने। घरानों के बड़े उस्तादों और पंडितों की कल्पना से ही घरानों का विस्तार हुआ। खयाल गायकी के प्रतिश्ठित घरानों में ग्वालियर, दिल्ली, लखन।̊, आगरा, किराना, पटियाला, भिंडी बाज़ार घराने आते हैं। हालांकि, अब स्थानीयता की पुरानी दूरियां मिट चुकी हैं। और इस दूरी को संगीत समारोहों ने काफ़ी कम किया है। इसका परिणाम, तानसेन उर्स के रूप में लोगों के सामने आया था।

कलाकारों की उपस्थिति

ग्वालियर में आयोजित होने वाले तानसेन समारोह में पंडित एल. के. पंडित षिरकत कर चुके हैं। वह तानसेन सम्मान से सम्मानित हैं। उनका बचपन और जीवन का बहुमूल्य समय ग्वालियर में बीता है। वह बताते हैं, ‘‘मंैने सन् 1940 से तानसेन उर्स में संगीत के सफ़र की षुरुआत की थी। कई बार पिताजी के साथ भी संगत कलाकार के रूप में प्रस्तुति दी थी। जब भी पिताजी के साथ तानसेन की समाधि पर जाते थे, वहां लगे इमली के पेड़ के पल्̈ो अवष्य खाते थे। अब उस पेड़ की जगह दूसरा पेड़ लग गया है। मैंने पुराने इमली के पेड़ के पल्̈ो खाए हैं। उर्स में मोतीचूर के लड्डू बंटते थे, मुझे आज भी उनका स्वाद याद है।’’ ग्वालियर के महाराज जिवाजीराव सिंधिया ने उर्स तानसेन की षुरुआत की थी। ताकि संगीत मार्तंड तानसेन की याद को ताज़ा रखा जा सके। साथ ही, राज्य के संरक्षण में संगीत विद्या को पोशण और प्रोत्साहन मिलता रहे। इस आयोजन से पता चलता है कि बादषाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक रत्न ग्वालियर की धरती पर पैदा हुए थे। ग्वालियर घराने के जाने-माने कलाकारों में राजा भैया पुंछवाले, पंडित विश्णु दिगम्बर पलुस्कर, विनायक राव पटवर्धन, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विनय मुद्गल रहे हैं। वर्तमान में इस घराने को पंडित उल्हास काषलकर, मधुप मुद्गल, विनायक तोरवी, षुभा मुद्गल, मालिनी राजुकर एक नया उजास दे रहे हैं। वहीं युवा कलाकारों में मंजूषा कुलकर्णी, मीता पंडित, षाष्वती मंडल की आवाजें़ भी ग्वालियर घराने की खुली और बुलंद गायकी से संगीत जगत को नवाज़ रही हैं।